Friday, January 1, 2021

कर सको तो करो।


हर नव- वर्ष की शुरुवात लोग नई प्रेरणा और नए संकल्प के साथ  करते हैं , इस तरह "न्यू यर रेज़ोल्यूशन" लेने की प्रथा चली आ रही है और चलती रहेगी। 

नव - वर्ष २०२१ की शुभ-कामनाओं के साथ  मेरी यह प्रेरक कविता "कर सको तो करो " 










 कर सको तो करो मित्रता,

शत्रुता से दूर रहो। 

बना सको तो दोस्त बनाओ,

लोगों में तुम प्यार बढ़ाओ। 


बोल सको तो मधुर बोलो,

करवाहट मत घोलो। 

शीतल जल सी मीठी वाणी,

मन को शीतल करती है,

कभी - कभी बाणों से ज़्यादा ,

वाणी ही आहत करती है। 


मिटा सको तो दुश्मनी मिटा दो,

नहीं तो दुश्मनी मिटा देगी। 

आने वाली पीढ़ी को,

तुम्हारे संग पिटवा देगी। 


घटा सको तो तिमिर घटाओ ,

अपने मन में उल्लास जगाओ। 


पारस पत्थर लोहा छू कर ,

सोना उसे बना देता है। 

पर अपनी शक्ति वह ,

सोने को न दे पाता  है। 


पारस पत्थर से अच्छा,

तुम खुद को दीप बना लेना। 

दीप जलाने की शक्ति,

हर दीपक में पहुंचा देना। 


सीख सको तो हँसना  सीखो,

कीमती होते हँसी  के क्षण ,

जो जितना हँसता है,

उतना खुश रहता उसका मन। 


 पी सको तो गुस्सा पीलो,

क्रोध अक्ल को खाता है। 

प्यार और शान्ति से बोल कर देखो ,

काम सुलभ हो जाता है। 

 

कितने भी गहरे रहें गर्त,

स्नेह हर जगह जा सकता है। 

कितना ही भ्रष्ट ज़माना हो ,

स्नेह सब को भा सकता है। 


नए संकल्पों की बेला ,

ले कर आया नव - वर्ष। 

है यह मंगल -कामना,

हो सब का उत्कर्ष। 

© अनंता सिन्हा

01.01.2021


Saturday, November 21, 2020

यदि तुम मुझ से मित्रता करना...................





 यदि तुम मुझ से मित्रता करना,

तो केवल  मित्रता के लिए करना। 

मुझे मेरी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ अपनाना,

हाँ, बाद में तुम मेरी बुराइयाँ  सुधार देना। 


 तुम मुझसे मित्रता इसलिए मत करना,

 क्यूँकि  मैं हिंदी में अच्छी हूँ। 

क्यूंकि यह जान कर  तुम मुझ से मित्रता तोड़ दोगे,

मैं गणित में बहुत ही बुरी हूँ।  


तुम मुझ से मित्रता मेरी सहायता मांगने के लिए मत करना,

ना ही  मेरी सहायता करने के लिए करना। 

यदि  मुझ से मित्रता  करना,

तो उसे कभी मत तोड़ना। 


यदि तुम मुझ से मित्रता करना,

तो मुझे मेरी भूल ज़रूर बताना,

मेरा गलत काम में साथ मत देना।


मुझे टूटने मत देना ,

मुझे भटकने मत देना, 

मुझ पर संदेह मत करना ,

मुझे हमेशा क्षमा करना ,

और मुझ पर अपनी मित्रता का अधिकार हमेशा जताना। 


हम जब भी मित्रता करेंगे,

उस स्नेह के लिए करेंगे  जो हम एक -दुसरे को देंगे,

उस आनंद के लिए जो हम एक साथ समय बिता कर  पायेंगे,

उन खेलों के लिए  जो हम एक साथ खेलेंगे ,

उस विनोद के लिए जो हम एक साथ  करके हँसे- हंसाएँगे,

उस मानसिक बल के लिए जो हम एक -दुसरे से पाएँगे,

उस साथ के लिए जो हम सदा निभायेंगे। 


© अनंता सिन्हा । 


 

Friday, October 23, 2020

स्नेहामृत











परस्पर स्नेह की अमृत- धारा,

 इस  जग में जहाँ बह जायेगी। 

क्षमा, दया और करुणा ,

वहाँ स्वतः चली आएगी। 


अपरिचित को अपरिचित से ,

सहायता सुलभ मिल जायेगी। 

असहाय और दीन भावना,

स्वतः नष्ट हो जायेगी। 


स्नेह की अमृत धार पा कर ,

रोगी  भी स्वस्थ हो जाएँगे। 

बंदीगृह मनोचिकित्सालय ,

 युद्ध-क्षेत्र  खाली हो जाएँगे। 


स्नेह भाव से ओत - प्रोत,

मनुष्य हिंसा नहीं कर पायेगा। 

करुणा और क्षमा-शीलता से परिपूर्ण,

ह्रदय क्रोध पर  विजय  पा जाएगा। 


स्नेह के कारण कण कण में, 

भगवंत  समा  जाएँगे

मंदिर - मस्जिद  जाए बिना ही,

 ईश्वर मिल जाएँगे। 


स्नेह के वश  माँ  भगवती  भी,

पुकार सुन दौड़ी  आएँगी। 

हो स्नेह-पूर्ण  हृदय  हमारा,

 पत्थर की मूरत भी मुस्कायेगी। 


स्नेह-रूपी जल से,

क्रोधाग्नि  बुझ  जायेगी। 

मधुरता का वास होगा ,

कटुता न स्थान ले पाएगी। 


अतिशय स्नेह के कारण 

पाषाण  पिघल जाएँगे। 

मरणासन्न  उठ  खड़े  होंगे ,

निर्जीव  जीवित  हो  जाएँगे। 


 स्नेह की अमृत -धार जहाँ ,

वहाँ  त्याग आ जायेगा। 

मुझ को तुम से अधिक मिले,

यह लोभ मिट  जाएगा। 


भूमि , धन और सत्ता के लिए ,

रक्तपात बंद हो जाएगा। 

मानवता का मानवता से,

अटूट संबन्ध  जुड़ जाएगा। 


बड़ी से बड़ी कमी भी,

 स्नेहामृत से पूरी हो जायेगी। 

स्नेहामृत की जीवन दायनी धारा ,

पूर्णता को परिपूर्णता  दे जायेगी। 


                                                


©अनंता सिन्हा 

12.10.2014




 





Sunday, August 23, 2020

पुस्तकें







A Third of Teenagers Don't Read Books for Pleasure Anymore | Time



                                                                    Literature books read heart hobby book bookshelf | Free Photo



Mom and child reading a book Stock Photo by choreograph | PhotoDune


बिना किसी सूत्रधार के मुझे अनगिनत कथाएं सनातीं हैं,

चमत्कारी रूप से अलग संसार में ले जातीं हैं। 


प्राचीनता से आधुनिकता की  यात्रा मुझे कराती हैं ,

विविध देश विदेश के पर्यटनों  पर ले जातीं हैं। 


महा-पुरुषों के जीवन की गाथाएं वह गाती  हैं,

हमारी संस्कृति से हमारी पहचान कराती हैं । 


कभी मनोरंजन , कभी मनोमंथन का साधन बनतीं हैं ,

देतीं सुविचार हमें , जीवनमूल्य सिखातीं हैं। 


ज्ञान का भंडार दे, समस्या का  समाधान सुझातीं  हैं ,

मेरी एकाकी में मेरी पुस्तकें सहस्त्र  सखियों का धर्म निभातीं हैं।  

©अनंता सिन्हा 

12.10.2015

Friday, August 14, 2020

स्वातंत्र गाथा

 








हे प्राणप्रिय जीवन संगिनी, 
गृह लक्ष्मी मेरे आंगन की,
मेरी हृदय उल्लासिनी,
स्वामिनी मेरे मन की।

जब तुम मुझ से ब्याह कर घर आयी थी,
यह बात न मन में लायी थी,
तेरे पायल की झनक से, 
तेरे कंगन की खनक से,
यूँ दूर मैं चला जाऊंगा,
तेरे समर्पण को यूं  ठुकराउँगा।

पर मैं नहीं पति बस तेरा हूँ,
मैं भारत माँ का भी बेटा हूँ 

इस भूमि पर घुसपैठ किया,
आए बन कर व्यापारी, 
अब शासक बन बैठे हैं,
यह अंग्रेज़ी अतिक्रमणकारी।

दीन-हीन जनता भारत की,
कष्ट सह रही भारी,
गौ और विधवा को सता रहे हैं,
यह विदेशी अत्याचारी।

तुम्हें छोड़ मुझे अब जाना होगा, 
अपना धर्म निभाना होगा,
कर विजय तिलक मेरे माथे पर,
तुम मुझ को विदा करो अब हंस कर।


तुम पत्नी हो एक वीर पुरुष की,
नहीं कोई सामान्य नारी हो,
भले जन्मी तुम साधारण घर में,
 पर मन से तुम क्षत्राणी हो।


पुण्य-भूमि भारत माता की,
कल रणभूमि बनेगी,
शीष कटेंगे आतताइयों के,
धरती लहू पीयेगी।

स्वाधीनता संग्राम की अग्नि से,
ग़ुलामी  के बंधन टूटेंगे। 
प्राणों की आहुति देकर,
पराधीनता  के शाप से छूटेंगे। 

जब भी मनुष्य इस पृथ्वी पर जन्म लेकर के आता है,
स्वाभिमान पूर्ण स्वतंत्र जीवन का उपहार ईश्वर से पाता है।

फिर हम क्यूँ छिन जाने दें,
अपने जन्मसिद्ध अधिकारों को,
क्यूँ मौन हो सहते रहें निशिदिन,
इनके अत्याचारों को।

स्वाभिमान के कुचले जाने से,
शस्त्र उठाना अच्छा है,
रोज़ रोज़ तिल-तिल मरने से,
एक बार मर जाना अच्छा है।

अतः प्रिये मुझे अब जाने दो,
अपना करतब कुछ दिखलाने दो।
मैं लौट अवश्य ही आऊंगा,
यह मेरा वचन है तुमसे,
आऊँ भारत माँ को मुक्त करा कर,
या अर्थी पर चढ़ के।

घर से चला वह वीर,
अपनी पत्नी से इतना कह कर,
मर-मिटा अपनी जन्म-भूमि पर,
लौटा कफन में बंध कर।

थी धन्य उस वीर की पत्नी,
न निकली मुख से करुण पुकार,
उसका स्वागत करने आई,
कर सोलह श्रृंगार।
 
उसको करबद्ध नमन किया,
लिया अपने आलिंगन में,
नयनों में अश्रु रोक कर,
कहा रुंधे गले से।

हो धन्य तुम भारत के गौरव,
है धन्य तुम्हारा स्वाभिमान,
तुम नहीं केवल हो मेरे प्राण,
देश - भक्ति के तुम भूषण महान।

इसी प्रकार कई वीरों ने,
अपने घर से विदा ली,
स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े,
और जान की बाज़ी लगा दी।

इसी प्रकार कई पत्नियों ने,
अपना सिंदूर मिटाया,
इसी प्रकार कई माताओं ने,
 अपनी कोख लुटाया|

इसी प्रकार कई बहनों ने,
 अपने भाई की बलि चढ़ा दी,
इसी प्रकार कई पुत्रियों ने,
अपने पिता को सदा के लिए विदा दी।

इन्हीं वीरों के बलिदानों से,
हम ने स्वतंत्रता पायी,
आज़ादी की चादर ओढ़े,
पंद्रह अगस्त की तिथि आयी।

पर कहीं नहीं इन वीरों का,
 इतिहास में नाम लिखा है,
इनके असीम बलिदानों को,
बस काल चक्र ने देखा है।

ऐसे ही एक गुमनाम वीर की,
में यह कथा सुनाती हूँ,
इन्हें और इनके परिवारों को,
में नित नित शीष झुकाती हूँ।

©अनंता सिन्हा
 15/8/2017

ऑडियो :- अनंता  सिन्हा (सर्वाधिकार सुरक्षित )

Monday, August 10, 2020

विशेष सूचना

 मुझे यह बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि मेरी लिखी कविताओं को मेरी बहुत ही प्यारी और मुझे सदैव ही प्रोत्साहित  करने वाली भारती आंटी  मेरी कविताओं को स्वर दे कर मेरी कविताओं और मेरे ब्लॉग की सुंदरता को और भी  बढ़ा रहीं हैं। वे अनन्य साहित्य प्रेमी हैं और हिंदी भाषा के प्रति उनका लगाव हम सब के लिए एक प्रेरणा है। 

उनका यह स्नेह मेरे लिये बहुत ही अमूल्य है और  उनका मेरी कविताओं को स्वर देना मेरे लिये उनका आशीष है।

आज उनकी आवाज़ में सुनिये  "एक शिक्षिका की दृष्टि से"


Sunday, August 2, 2020

विनती


करती  हूँ मैं वंदना नत सिर बारंबार,
मुझे  दें परमात्मन नित मंगल शुभ कार्य। 

दोनों  कर ये जोड़ कर  करती हूँ अनुरोध ,
प्रेम की सरिता बहे , मिटे  क्रोध- प्रतिशोध। 

संशय वृत्ति मिटाइये , दीजिये विनय का दान ,
सब के मन विश्वास बढ़े, विसर्जित हो अभिमान। 

क्षमा सभी को कर  सकें हम मन से घृणा को त्याग,
भीतर कभी न भस्म करे हमें द्वेष की आग। 

संबंधों  को जोड़ कर , कीजिये यह उपकार,
अपनों का संग  दीजिये, एकाकी उतारें  पार। 

कुसंग से सदा बचाइए, दें सच्चे मित्रों  का संग ,
दीपावली में दीप जलें , बरसे होली में रंग। 

महावीर  रघुवीर - दूत,  मंगल मूर्ती रूप ,
प्राप्त करूं मैं आपको अपने भ्राता स्वरुप। 

पूज रही हूँ आपको अपना अग्रज मान,
रक्षा मेरी कीजिये  मेरे प्रिय हनुमान। 

©अनंता सिन्हा

जन्माष्टमी विशेष

इकलौती संतानें! - रक्षाबंधन विशेष

तुम कहते हो, हमारे भाग्य बड़े महान हैं। माता - पिता के लाड़ले,  हम इकलौती संतान हैं। मुंह -मांगा खिलौना हमें मिल जात...