Monday, June 29, 2020

क्षमायाचना




माता प्रकृति, विनती है तुमसे,
करना तुम स्वीकार हृदय से,
मेरी यह क्षमायाचना।

क्षमा मांगती हूँ उन प्रहारों के लिए,
जो हम निर्दयता से तुम पर करते हैं।
उस असीम दुख के लिए,
जो हम हर क्षण तुमको देते हैं।

पालन पोषण हुआ हमारा तुम्हारे ममता मयि आँचल में,
फिर भी हम इतने निर्मम क्यूँ हो जाते हैं?
यह जान कर की धन जीवन नहीं है,
हम लोभ में पड़ जाते हैं।

अनेक घर और चार गाड़ियाँ हों,
तो हमारा मान समाज में  बढ़ जाएगा।
पर हम ये भूल जाते हैं ,
कि वनों और प्राणवायु बिना हमारा जीवन ही मिट जाएगा।

हम स्वार्थी हैं जो ये नहीं समझ पाते हैं,
की खेल और व्यवसाय मान कर हम जो कुछ भी कर जाते हैं।
वही कार्य हमारे तुमको शोकाकुल कर जाते हैं।

पशु- पक्षी का शिकार,
मनोरंजन के लिए करते हैं।
वृक्ष काट काट कर,
कनक भवन बनाते हैं।

एक छोटी सी चोट लगने पर कितनी पीड़ा हमें होती है,
हम ये क्यूँ भूल जाते हैं?!
तुम्हारे अनगिनत निर्दोष सन्तानों की,
हत्या हम कर जाते हैं।

जब इस से भी हमारा मन नहीं भरता,
हम हिंसा को पूजा बनाते हैं।
शायद इसलिए क्यूंकि जगदम्बा को,
हम केवल मंदिर में ही देख पाते हैं।

क्षमा करो हे जगत- जननी वसुंधरा,
जो हम तुम्हें न भगवती मान पाते हैं।
तभी तो हर विजयदशमी हम,
पशुओं की बलि चढ़ाते है।

दिया तुमने सब कुछ हमें,
स्वच्छ और परिपूर्ण था।
अन्न जल वसन भूषण,
कहो कहाँ कुछ कम था?!

पर आज हमने अपनी नदियों को,
प्रदुषित इतना कर दिया।
की आज गांव का गांव,
एक बूंद पानी के लिए तरस गया।

उपवनों का नाश  कर,
हम तुम्हें वर्षा करने में असक्षम बनाते हैं।
फिर अकाल के समय तुम्हें विक्राल कह कर ,
तुम पर ही लांछन लगाते हैं।

पर में तुमसे बरम बार क्षमा मांगती हुँ,
चाहे यह निश्चित न हो, 
कि मैं तुम्हारे लये क्या कर सकती हूँ?

पर हाँ, जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हो जाउंगी,
अपने कमाए धन का दसवां हिस्सा,
तुम्हारे संरक्षण में लगाउंगी।

अभी मैं तुम्हें इतना वचन बस दे सकती हूँ,
की माँ मान कर पुजती हूँ  तुमको,
अपनी प्रिय सखी मानती हूँ।
चहे मिले तीनों लोकों का भोग- विलास मुझे,
मैं कभी न दूंगी तुम्हें कोई प्रताड़ना,
पर हाँ मैं तुमसे बारम बार करूँगी क्षमायाचना।

©अनंता सिन्हा
5/6/2014










   ऑडियो :- भारती  आंटी  साभार

Sunday, June 28, 2020

जब हनुमान जी स्वयं बोले

तुम सोचते हो मैं केवल यही हूं ,
अब देखो मैं कहां नहीं हूं। 
मेरा विराट स्वरूप देखो, 
मेरा पर्वताकार रूप देखो ।

मुझे में धरती आकाश देखो, 
मेरा दिव्य प्रकाश देखो।
मेरी उन्नत ललाट देखो,
मेरे दशों ये हाथ देखो।

मेरे इन्हीं करों में शंख देखो,
वेद पुराण असंख्य देखो।
मेरा रूप तनिक विक्राल देखो,
हाथों में गदा, खड्ग और ढाल देखो।

हाथों में अग्निकुंड और भाल देखो,
मुझ में ही सारे काल देखो।
हाथों में निषंग और चाप देखो,
मुझ में भस्म होते सब पाप देखो।

मुझे अपने यत्र तत्र देखो,
मेरे विलग रूप सर्वत्र देखो।
सुदर्शन चक्र और त्रिशूल देखो,
मुझ में ही सृष्टि का मूल देखो।

मैं ही प्रभात, मैं ही निशा,
मैं आठो प्रहर चारों दिशा।
मिट्टी भी मैं, मीनार भी हूँ,
मैं ही सार नि:सार भी हूँ।

मैं सगुण और साकार हूँ,
मैं निर्गुण और निराकार हूँ।
मैं सगुण और निराकार भी हूँ,
मैं निर्गुण और साकार भी हूँ।

मैं ही प्रत्यक्ष, मैं ही परोक्ष,
मैं ही बंधन और मैं ही मोक्ष।
लेता जन्म सकल संसार मुझ में,
होता महासंघार मुझ में।

ज्वालामुखी और चक्रवात,
आँधियाँ, झंझारवात।
सृष्टि का सृजन और लय भी मैं हूँ,
आने वाला महाप्रलय भी मैं हूँ।

कंकर भी मैं हूँ, भयंकर भी मैं हूँ,
एकादश रुद्र शंकर भी मैं हूँ।
कल्प, युग मनोवन्तर भी मैं हूँ,
भीतर झांको, तुम्हारे अंतर में मैं हूँ।

यूँ तो मैं सारे संसार को नृत्य कराता हूँ,
पर प्रेम पाश में बंध जाता हूँ,
भाव से खिंच कर आता हूँ,
भक्ति के आगे झुक जाता हूँ।

अब अपना भय संकोच त्यागो,
जन्म अपना सुफल  जानों,
मुझ में मिटता सकल परिताप देखो,
विलीन होता शोक सन्ताप देखो।

यह देखो क्रोध का अब मरण,
यह देखो ग्लानि का हरण,
मुझ में सभी सम्बन्ध देखो,
जीवन के हर अनुबन्ध देखो।

मेरा शाश्वत संग देखो,
लो मित्रता भी अभंग देखो,
एक अचल अवलम्ब देखो,
शुभ लाभ का आरम्भ देखो।

यह देखो संकट का हरण,
यह देखो व्याधि का शमन।
घृणा द्वेष का अंत देखो,
मुझ में प्रीति अनंत देखो।

मिटते सभी अपवाद देखो,
मुझ में मधुर संवाद देखो।
अपनी एकाकी का नाश देखो,
शत्रुता का विनाश देखो।

जीवन का हर रंग देखो,
वीना और सारँग देखो,
डमरू और करताल देखो,
मुझ में सप्त सुर और ताल देखो।

मुझ में देखो असंख्य रामायण,
मुझ में देखो असंख्य कृष्णायण।
मुझ में देखो अनंत हरि- कथा,
मुझ में ही देखो भक्ति अथाह।

मेरा दृढ़ विश्वास देखो,
संशयों का नाश देखो।
पूरी होती अपनी आस देखो,
जीवन का उल्लास देखो।

मुझ में ज्ञान का भंडार देखो,
अविद्या का संघार देखो।
साहस का संचार देखो ,
भय दुर्बलता का संघार देखो।

मेरा हृदय उदार देखो,
वक्ष-स्थल विशाल देखो।
मेरे हृदय में सिया राम देखो,
करुना-निधान सुख-धाम देखो।

थमते द्वंद संग्राम देखो,
इस जग का विश्राम देखो।
 मुझ में विनय सम्मान देखो,
विसर्जित होता अपना अभिमान देखो।

क्षमायाचना और क्षमादान देखो,
प्राणिमात्र का कल्याण देखो।
फिर भी यदि मन किंचित सभय हो,
तो मेरे इन चरणों को देखो,

त्रास के भक्षण को देखो,
अपने संरक्षण को देखो।
इनमें शन्ति का वास देखो,
लो इनमें अपना भी निवास देखो,

मेरी करुणा मेरा वात्सल्य देखो,
अब मेरा चांचल्य देखो।
तुम मेरे उस निर्मल स्वरूप को देखो,
तुम मेरे बालरूप को देखो।

देखो मुझे जैसे तुमने भजा है,
चंदन का तिलक माथे पर सजा है।
मेरा सौहार्द मेरी प्रीति देखो,
अपने भ्राता महावीर देखो।

   ©अनंता सिन्हा
12. 10. 2017






जन्माष्टमी विशेष

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