Thursday, August 26, 2021

जब कान्हा आए .................. (कहानी )

 







तेरह साल की रेणुका अपनी दादी  के साथ भागवत कथा सुनने द्वारिकाधीश आयी थी। ऐसे तो उसके माता-पिता साथ आते पर उन्हें दफ्तर का कुछ ज़रूरी काम आ गया।
दादी को अकेले भेजा नहीं जा सकता था सो रेणुका को उनके साथ भेज दिया गया। रेणुका को कान्हा जी से बहुत लगाव था तो जब दादी ने कहा कि वहाँ कान्हा जी मिलते हैं तो वो खुशी-खुशी मान गयी ।

दोनों सवेरे से ही कथा पंडाल में जा बैठी थीं।  रेणुका की अब एक ही प्रतीक्षा थी, कब उसके कान्हा जी उससे मिलने आयें और कब वो उनसे अपनी मनचाही इच्छा माँगे । कथा विराम लेने को थी की तभी एक बच्चा रेणुका के पास आ कर खड़ा हो गया। उसकी आयु कुछ चार- पाँच  वर्ष की होगी।

उसने रेणुका से कुछ खाने को माँगा, रेणुका ने उसकी ओर देखा तो नज़रें टिकी रह गईं। उसका प्यारा साँवला सा चहरा, प्यारी सी अबोध मोहक आँखें और छरहरा शरीर। उसके तन पर कोई कपड़ा नहीं था सिवाय एक  पीले फ़टे कच्छे के ।


"दादी, कुछ खाने के लिये है क्या" रेणुका ने पूछा, वह अभी भी एक टक उस बच्चे को देख रही थी।
"नहीं बेटा, पर कथा में जो प्रसाद मिलेगा, वो इसे खिला देंगे।" दादी ने कहा और फिर उस बच्चे की ओर देख कर मुस्करा दिया।

रेणुका ने बच्चे को अपने साथ बैठा लिया और प्यार करने लगी। जब प्रसाद मिला तो रेणुका ने उस बच्चे को खाने को दिया पर उसने कुछ खाया नहीं। "अरे खाओ"  रेणुका ने कह कर उस बच्चे के  कंधे पर हाथ रखा तो उसे उसका कंधा  गर्म लगा। रेणुका ने उस बच्चे का माथा छुआ, वह बुखार से तप रहा था।
"दादी, इसे तो बुखार है। क्या करें?इसको हम अपने कमरे में ले चलें क्या?  रेणुका ने पूछा, उसके स्वर में अनुरोध मिश्रित था।
"हाँ बेटा, ज़रा जल्दी ही चल" इतना कह कर दादी ने बच्चे को गोद उठाया उर रेणुका का हाथ पकड़ कर धर्मशाला की ओर चल पड़ीं।

कमरे तक पहुँचते पहुँचते दादी बहुत थक गयीं थीं, वे अपना घुटना पकड़ कर चारपाई पर बैठ गयीं।
"आप बैठ जाइये दादी, इसके माथे पर पट्टी मैं कर देती हूँ, आपको करते हुए देखा है।" रेणुका ने यह कह कर अपनी दादी को आराम तो दिया ही, उस बच्चे के साथ खेलने का अवसर ले लिया।

रेणुका ने उसे पास वाली चारपाई पर लेटा दिया और बड़े प्यार से पट्टी करने लगी। वह एक स्नेहिल स्वभाव की लड़की थी और उसे इस बच्चे से मित्रता करने की इच्छा हुई।

बच्चा बुखार से व्याकुल था तो रेणुका उसका मन बहलाने के लिये अपनी दादी का सिखाया हुआ एक भजन गाने लगी। उसके भजन गाते ही वह बच्चा खिलखिला कर ज़ोर  ज़ोर  से हँसने लगा।
"अरे!तुम हँस क्यूँ रहे हो?" रेणुका ने उस बच्चे से पूछा।
"तुम मुझे अभी भी बुला रही हो, मैं तो पहले ही आ चुका हूँ।" बच्चे ने  खिलखिलाते हुए बड़े नटखट स्वर में  जवाब दिया।
यह सुनकर  रेणुका और उसकी दादी, दोनों चकित रह गईं। उसका बुखार उतर चुका था।

"तुम्हारा नाम क्या है?" रेणुका ने बच्चे से पूछा । "जो तुम पुकारो" बच्चे ने फिर अपनी गर्दन टेढ़ी कर के, एक भोली मुस्कान मुस्करा दी।रेणुका उसकी बातें सुनकर बड़ी आनंदित हो रही थी, उसने उस बच्चे के गाल पर हाथ रख कर दादी से पूछा "क्या नाम रखें इसका दादी?'' 

दादी ने कुछ सोंचा फिर निर्णय रेणुका पर छोड़ दिया " तू ही रख दे ना अपने नये मित्र का कोई प्यारा सा नाम"। 

"कान्हा" रेणुका ने उत्साहित हो कर कहा।

"हाँ कान्हा सही रहेगा और फिर ये हमें द्वारिकाधीश में मिला है" दादी ने रेणुका के चुनाव की बड़ी प्रशंसा की।
दोनों को उसे इस नाम से पुकारने में बड़ा मज़ा आया।रेणुका ने कान्हा को अपने एक जोड़ी कपड़े पहना दिए।

दादी ने सोंचा की जिस एन.जी.ओ के द्वारा इस कथा का आयोजन हो रहा है, कल कान्हा को उसी को सौंप देंगे पर ऐसा हुआ नहीं। जाने ऐसा क्या था कान्हा में कि दोनों में से किसी को उसे दूर करने का मन ही नहीं होता था।

कान्हा के साथ खेलने और उसका ध्यान रखने में रेणुका यह बात बिल्कुल भूल गयी थी कि उसके कोई मित्र नहीं थे। बल्कि यही तो वह कान्हा जी से यहाँ माँगने आयी थी।
अगले दिन से वह कान्हा को भी अपने साथ कथा में ले जाने लगे। जब तीसरे दिन की कथा विराम ली तो तीनों  कान्हा के लिए कपड़े खरीदने बाज़ार गये ।
दादी ने धर्मशाला में ही कहा था “ कान्हा के पास अपने एक जोड़ी कपड़े नहीं हैं, दो दिन से तेरे कुर्ते-सलवार में घूम रहा है”।

द्वारिका के बाज़ार की छटा देखते बनती थी। ऐसा एक दुकान नहीं था जिसका नाम भगवान कृष्ण पर न रखा गया हो। इन दुकानों में बिकते डांडिया, सजावटी दिए और मटके, रंग बिरंगे काम वाले लहंगे गुजरात की समृद्ध संस्कृति को दर्शा रहे थे।एक दुकान से कान्हा के कपड़े ले लिए गए, रेणुका ने अपने लिये भी एक सुंदर गुलाबी रंग का लहंगा खरीदा।

बाज़ार से लौटते समय रेणुका को भूख लगी तो दादी ने सोचा खाने के लिए कुछ फल ले लिए जाएँ। फल की दुकान सड़क के उस पार थी।  इतने भीड़ में दोनों बच्चों को सड़क पार कराना कठिन होता इसीलिए दादी ने उन दोनों को दुकान के बाहर ही छोड़ा “बेटा, यहीं रहना, कान्हा के हाथ पकड़े रहना, मैं सामने फल खरीद रही हूँ।

दादी सड़क पार कर के रेड़ी पर पहुँची ही कि रेणुका पर संकट आ गया। अचानक बाज़ार में भगदड़ मच गयी। लोग घबरा कर इधर उधर भागने लगे। इस भगदड़ में किसी ने रेणुका को धक्का दिया और वह गिर पड़ी। सामने देखा तो एक अनियंत्रित सांड उसकी ओ दौड़ा चला आ रहा था। रेणुका इतनी भयभीत हो गयी कि चिल्ला भी न सकी। उसने कान्हा को कस कर अपने से चिपटा लिया, उसके सहमे हृदय से एक के बाद एक प्रार्थनाएँ फूट रहीं थीं। उसने कस कर अपनी आँखें बंद कर ली पर तभी मानो समय रुक गया। इसके बाद क्या हुआ, यह उसे नहीं याद  रहा पर रेणुका को कोई हानि नहीं पहुँची थी, यह निश्चित था।

जब रेणुका की आँख खुली तो वह उसी दुकान के भीतर एक कुर्सी पर थी, कान्हा उसके सीने से वैसे ही चिपटा हुआ था। दादी दोनों बच्चों को बड़े प्यार से देख रहीं थी “ थक के सो गयी मेरी बच्ची, चल धर्मशाला चलते हैं”।

इन सभी दिनों रेणुका को बहुत आनंद आया। कान्हा दोनों से बहुत घुलमिल गया था और बड़ी शरारतें करता था। अपने हिस्से के दूध के साथ साथ रेणुका के हिस्से का दूध भी पी जाता। जब रेणुका अपने लिये ब्रेड और मक्खन मंगाती तो आधा मक्खन कान्हा चट कर जाता । रेणुका को उसे इस बात पर प्यार से झगड़ने में बड़ा मज़ा आता। वह कहती “ कान्हा, तू फिर मेरा मक्खन खा गया। आज अपनी चॉकलेट नहीं बाटूंगी तेरे साथ” और कान्हा हँसने लग जाता तो वह भी हँसने लग जाती।
दोनों बच्चे दिन भर पकड़ा-पकड़ी खेलते रहते।

इसी बीच तीनों द्वारकाधीश के मंदिर भी गए। दर्शन का आनंद अनूठा था पर आरती में रेणुका अचानक अस्वस्थ हो गयी । उसकी जीभ और उसका कण्ठ बुरी तरह सूखने लगा और पेट में मरोड़ें उठन लगीं। उसने अपना पेट पीड़ा से कस कर पकड़ लिया “ दादी मुझे ठीक नहीं लग रहा है”। दादी उसकी हालत देख कर बड़ी चिंतित हो गईं। उन्हों ने रेणुका को संभाला और मन ही मन  प्रार्थना करने लगीं “ हे भगवान, यहाँ तो शुभ काम के लिए आएँ हैं, बच्ची को अस्वस्थ मत होने देना”। इतने में कान्हा दादी का आँचल खींचने लगा, उसके हाथ में एक लड्डू था। “दादी, मैं यह रेणुका को खिला दूँ?” कान्हा ने इतना कह कर लड्डू अपने हाथों से रेणुका के मुँह में डाल दिया। रेणुका ने अपनी आँखें बंद कर ली, इतना मीठा और स्वादिष्ट लड्डू उसने कभी नहीं खाया था। धीरे धीरे रेणुका की पीड़ा जाती रही और वह फर से सामान्य हो गयी। दोनों दादी पोती ने भगवान द्वारिकाधीश  को धन्यवाद दिया तो कान्हा पुनः खिलखिला उठा और रेणुका से कहा " तुझे लड्डू मैं ने खिलाया", "हाँ कान्हा, थैंक यू" कह कर रेणुका ने  हँस कर कान्हा को गले लगा लिया।

जल्दी ही द्वारिका- वास का आखिरी दिन आ पहुँचा, अगले दिन दोनों को अपने घर मुम्बई लौटना था। कल तो कान्हा को उस एन.जी.ओ को सौंपना ही पड़ेगा।

रेणुका बहुत दुखी हो गई। "कान्हा को तो हमें छोड़ना ही था न" उसकी दादी ने समझाया।
"पर कल से कान्हा नहीं होगा मेरे साथ खेलने के लिये, कौन खेलेगा मेरे साथ?" रेणुका यह कह कर रोने लगी।
"मैं खेलूँगा तेरे साथ" रेणुका ने पीछे मुड़ कर देखा तो कान्हा आकर उससे लिपट गया। उस समय रेणुका अपना सारा दुख भूल गई और कान्हा का पेट गुदगुदाने लगी । 
सोने का समय हुआ तो रेणुका कान्हा को अपने साथ सुलाने ले गयी। रेणुका और दादी एक बड़े वाले बिस्तर पर सोते थे और कान्हा बाजू के एक छोटे वाले बिस्तर पर।

रेणुका उसे बिस्तर पर लिटा कर उसके साथ ही बैठ गयी।  वह बहुत देर रात तक वहीं बैठी रही। चंदा मामा आकाश में चमक रहे थे और उनकी किरणे खिड़की से भीतर आ कर दोनों बच्चों के सर पर पड़ रही थी। तभी रेणुका ने देखा की कान्हा का रंग एक सुंदर नीलमणि से नीला हो रहा था, जैसे वह साधारण बालक नहीं, साक्षात श्री कृष्ण हो।रेणुका चकित रह गयी, उसने अपनी आँखें कस कर मली, अगले ही क्षण आँखें  खोली तो देखा कि कान्हा सोया हुआ है, वही साँवला सा प्यारा सा कान्हा। "कितना प्यारा है यह, अगर मेरा ऐसा कोई भाई होता तो मैं उसके साथ कभी झगड़ा नहीं करती, उसके साथ अपने सारे चॉकलेट, सारी किताबें , सारे खिलौने बांटती" रेणुका ने सोचा और सोचते सोचते वहीं कान्हा के साथ सो गयी।

आधी रात को रेणुका की नींद टूटी, उसने देखा तो कान्हा बिस्तर पर नहीं था। वह घबरा कर उठी और दादी के बिस्तर के पास गई। कान्हा वहाँ भी नहीं था। उसने पूरे कमरे में ढूंढा, सोफे पर,मेज़ के नीचे पर कान्हा कहीं नहीं था।

"तुम कहाँ हो कान्हा?" रेणुका ने रोते-रोते अपने आप से ही पूछा और फिर से कान्हा के बिस्तर की ओर मुड़ी, तभी उसे बिस्तर पर एक नीली चमक नज़र आई।  उसने अपनी आँखें मली, फिर देखा। चमक अब भी वहाँ थी। 

जब रेणुका बिस्तर के पास गई तो उसने देखा कि एक सुंदर सा  मोर पंख वहाँ रखा हुआ है।

अब रेणुका को सारी बात समझ आ गयी। वह खुशी से नाच उठी पर अगले ही क्षण थोड़ी मायूस हो कर बैठ गयी।

उसने वह मोर पंख उठाया और अपने सिर से लगाया फिर अपने हृदय से।

उसने अपनी दादी से सुना था  " सब की सहायता करो, कोई माँगने आये तो खाली मत लौटाओ, पता नहीं कब सहायता माँगने वाले के रूप में हरि आ जाएँ"। आज उसने देख भी लिया।

वह उस मोरपंख को लेकर अपने बिस्तर पर आ गयी। उसने अपने हाथ जोड़े और जितने दिन कान्हा के साथ रही , खेली, बातचीत की, उसके लिए कान्हा जी को बार- बार धन्यवाद दिया और उनके मोर पंख को अपने हृदय से लगा कर बड़े आनंदित मन से सो गई। इसके बाद रेणुका ने जीवन में कभी भी अकेलापन महसूस नहीं किया।

अनंता सिन्हा 

२६ /०८ /२०२१ 

जन्माष्टमी विशेष

जब कान्हा आए .................. (कहानी )

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