Saturday, July 25, 2020

जीवन - दायनी वर्षा




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हे वर्षा रानी आओ ,
आ कर अपना शीतल जल बरसाओ। 
बरसो राम धड़ाके से,
मरे न कोई फांके से। 

क्यूंकि जो तुम न होगी ,
खेतों में फसलें  नहीं उगेंगी,
लोहड़ी - बैसाखी नहीं मनेगी। 

नदियों में पानी न होगा,
सूखा कंठ तृप्त न होगा,
अशांत मन शीतल न होगा। 

 खाने को रोटी न होगी ,
शरीर में पुष्टि न होगी,
कागज़ की किश्ती न होगी। 

सावन का शुभ मास न होगा,
इच्छापूर्ति का विश्वास न होगा,
दुखी मन में उल्लास न होगा।

गणेश पूजा के उत्स्व  न होंगे ,
वर्षा के नृत्य न होंगे,
उपवन  में  न मयूर नाचेंगे,
बालक चंचल नहीं रहेंगे। 

न  राखी में रक्षा की आशा ,
न दीपावली में खील बताशा ,
होली का त्यौहार न होगा ,
तुम बिन जीवन का कोई सार न होगा। 

आने की दया हमेशा करना,
अकाल का संताप न देना ,
अनावृष्टि का शाप न देना। 

लेकिन हे जीवन दायनी ,
मेरी यह भी विनती है तुमसे। 
होना न कभी इतनी प्रचंड,
पुनः  खंड- खंड  हो उत्तराखंड। 

नदियों में उफान आ जाए ,
घर- गृहस्ती नष्ट हो जाए। 
थल  भी जल में मिल जाये ,
जन-जीवन का लय हो जाये। 

श्रध्दालु जो तीर्थ स्थल जाएँ ,
पुनः वहां से लौट न पाएँ ,
फिर कोई शिव प्रतिमा बह जाये। 

माना  कि बाढ़ लाने में ,
हमारा ही दोष है ,
जो मरते हैं , वो निर्दोष हैं। 

अनाथ होते बच्चे अबोध हैं ,
असहाय- अपंग निर्दोष हैं। 
पशु पक्षी  सदा अबोध हैं ,
अन्न उपजाता किसान निर्दोष है। 

इसलिए  हे पालन हारिणी,
तुम सदा पालन हारिणी ही रहना। 
कि सभी  तुम्हारी महिमा गाएँ ,
किसी महा विध्वंस का कलंक न कोई तुम पर लगाए। 



©अनंता सिन्हा
24/10/2020







Sunday, July 12, 2020

अहिल्या




                             
 

 
              कहीं उपेक्षित एक सती, दे रही कठोर परीक्षा थी।
         दूर कहीं एक शिला को, मुक्ति की प्रतीक्षा थी।

बरसों बाद सूनी डाली पर, 
ज्यों पक्षी ने गीत सुनाया था।
अहिल्या के उद्धार का,
समय सुहावन आया था।

काले घनघोर अंधेरे में,
दीपक के उजियारे थे।
विश्वामित्र गुरु के संग,
लक्ष्मण राम पधारे थे।

मिथिलापुरी के पथ पर,
प्रभु चलते चलते ठिठक गए।
वर्षों वीरान उपवन का,
रहस्य गुरु से पूछ लिए।

"हे गुरुवर, इस स्थल को देख,
मेरा मन आकुल होता है।
मौन अश्रुपात किसी का,
उर को व्याकुल करता है।"

"तीरथ सा पावन यह आश्रम,
कैसे यूँ वीरान है?
एक तुलसी ही जीवंत,
बाकी सब निष्प्राण है।"

"पर्ण कुटी के प्रांगण में,
पड़ी शिला यह कैसी है?
साधक की है अटूट समाधि,
या प्रतिमा देवी की है?"

गुरुवर बोले "हे राघव,
यहाँ ताप क्रोध का रहता है,
वासना की बलि चढ़ी, 
 नारी का सन्ताप यहाँ रहता है।"

"राम सुनो, यह शिला नहीं,
सती गौतमी अहिल्या है।
सम्पूर्ण नारी जाति की,
यह मूर्तिमान तपस्या है।

"शिला बनी इस सुपुनीता को,
तुमसे ही अब आशा है।
श्राप का विष पीती पतिता को,
तुम्हारे चरणों की अभिलाषा है।"

गुरु के वचनों को सुन,
असमंजस में राम पड़े।
माता - रूपिणी देवी पर,
कैसे अपने पाँव धरें।

रघुवर यह विचार रहे थे,
कि शिला से ध्वनि हुई।
वर्षों की मौन तपस्या,
अनायास ही बोल उठी।

"हे भगवन! सब ने मुझ पर,
 यथा - योग्य प्रहार किया।
इंद्र ने उपभोग बनाया,
पति ने भी शाप दिया।"

"फिर चरण शीष पर धरने से,
आप क्यूँ सकुचाते हैं?
क्या मुझे शापमुक्त करने से,
आप भी कतराते हैं?"

"तो फिर राम, यह काम करो,
मुझे शिला ही रहने दो।
विनती है एक यही,
मेरे प्रश्नों का उत्तर दो।

"दोष लगाया स्वामी ने,
मैं ने पर - पुरुष नहीं पहचाना।
त्रिकाल - दर्शी हो कर भी,
क्यूँ उन्होंने इंद्र आगमन न जाना।

"क्यूँ पूर्ण - समर्पित हो कर भी,
नारी त्याज्य  हो जाती है?
तन मन अर्पण करके भी,
तुच्छ मानी जाती है?"

"कभी परीक्षा, कभी अभीप्सा,
कभी कोप का भाजन बनती है।
क्यूँ पुरुषों के अपराध के लिए,
उंगली स्त्री पर उठायी जाती है।"

"जो मेरा शाप मिटायेंगे,
तो पतित-पावन कहलायेंगे।"

"पर सत्य कहिये हे रघुनन्दन,
क्या मैं सच मुच पतिता हूँ?
या कामुकता का आहार बनी,
सचरित्र परिणीता हूँ।"

सुन करुण पुकार अहिल्या की,
करुणासिन्धु करुण हुए।
करुणा के दो जल बिंदु,
कमल नयन में चमक उठे।

सन्मुख हो अहिल्या के,
राम हुए करबद्ध खड़े।
शीष नवा कर माता को,
राघव ने तब वचन कहे।

"नहीं माता, तुम पतित नहीं,
सुशील सदा, सुपुनीता हो।
सुरसरी गंगा सी निर्मल,
नारी जाति की गरिमा हो।"

"धरा को जीवन देने वाली,
नारी से कोई महान नहीं।
उसके शोषण से बढ़ कर,
मानवता का अपमान नहीं।"

"कठिन तपस्या से भी मैं,
सुलभ नहीं  मिल पाता हूँ।
पर कन्या  मुझको आराधे,
मैं सहज ही रीझ जाता हूँ।

तिरस्कार नारी जाति का,
है बढ़  कर सारे पापों से।
मुझ ईश्वर को भी प्रतीक्षा,
 समाज छूटे इस अभिशाप से।

  इतना कहकर, दीन- दयाल
उसे निज- चरणों का स्पर्श दिये।
कठोर काल के बंधन से,
भगवान भक्त को मुक्त किये।

©अनंता सिन्हा
12/07/2020







 










ऑडियो :- भारती आंटी साभार
 
 

Sunday, July 5, 2020

एक शिक्षिका की दृष्टि से



हर साल मेरी कक्षा में नए बच्चे आते हैं,
कई अबोध चहरे उस सूने कमरे में भर जाते हैं।

कुछ ही दिनों में वह सभी आपस में मित्र बन जाते हैं,
फिर पूरे दिन बातें कर कर के, वह कितना शोर मचाते हैं।

अपनी नटखट शरारतों से नित्य मुझे सताते हैं,
फिर भी यह बच्चे मेरे मन को बहुत भाते हैं।

सीखने की चाह लिये,
मन में नित्य नया उत्साह लिये।
नयनों में निश्चल अबोधता,
मुख पर प्रसन्न चंचलता।

सूर्य कहाँ से उगता है,
और कहाँ से ढलता है?
हमें सत्य क्यूँ बोलना चाहिए,
बुरी आदतें क्यूँ छोड़नी चाहिए?

कहाँ देश विदेश है,
परियों का कहाँ प्रदेश है?
भगवान कहाँ रहते हैं,
  क्या खाते हैं क्या पीते हैं?

कुछ सरल, कुछ रहस्यमयी,
उफ, ये प्रश्न खत्म ही नहीं होते हैं!

उनके प्रश्नों का उत्तर देकर,
मैं अपनी परीक्षा देती हूँ।
यदि उस में सफल हो सकी,
तभी उनकी परीक्षा ले सकती हूँ।

मेरा लक्ष्य केवल उन्हें साक्षर नहीं बनाना है,
उनके अंतर्मन के संस्कारों को भी जगाना है।

अनुशासन का पाठ पढ़ाने हेतु,
मुझे कभी कभी कठोर होना पड़ता है।
प्रेम भले भीतर से हो,
ऊपर से क्रोध दिखाना पड़ता है।

फिर भी, उन्हें दण्डित करने में,
कितनी कठिनाई होती है।
भयभीत वह हो जाते हैं,
पर पीड़ा मुझ को होती है।

वह चाहे कितनी भी भूल करें,
मुझे क्षमा करना ही है।
वह चाहे कभी अधीर हों,
धैर्य मुझे रखना ही है।
आखिर क्षमा, दया और करुणा का पाठ उन्हें मुझसे ही तो सीखना है।

पहले हर एक कार्य को,
वह असम्भव बतलाते हैं।
फिर धीरे धीरे
 प्रयास करने को तैयार हो जाते हैं।

कई बार असफल हो कर 
एक दिन सफल हो जाते हैं,
असम्भव को सम्भव करने का,
 साहस तब दिखलाते हैं।
वह क्षण मेरे जीवन के गौरव के क्षण होते हैं।

पर इसका अर्थ यह नहीं,
कि सिर्फ में ही उन्हें सिखाती हूँ।
जितना उनको देती हूँ,
उस से कई अधिक कुछ पाती हूँ।

बचपन की सहज निर्मलता,
जो आयु नष्ट कर जाती है।
सदा बच्चों से घिरे रहने में,
वह कुछ तो जस की तस रह पाती है।

पहले सप्ताह ,
 फिर महीने बीतते हैं।
समय के साथ, 
वह बच्चे मेरे दिल के और भी निकट हो जाते हैं।

परीक्षा में जब वह ,
अच्छे अंक लाते है।
या किसी प्रतोयोगिता में, 
 विजयी होकर आते हैं।

 मुझ से प्रशंसा पाने के लिए
 जिस तरह ललचाते हैं,
शिक्षक दिवस पर मेरे प्रति 
जो स्नेह  और आदर दर्शाते हैं,
वर्ष बीतने पर ये सब,
 मुझे बहुत याद आते हैं।

जब कभी मेरी याद,
उन्हें पुनः मेरे पास खींच लाती है,
उनकी यही अठखेलियां,
हम दोनों के लिए सुखद स्मृति बन जाती है।


 ©अनंता सिन्हा
    सन 2014




ऑडियो:- भारती आंटी  साभार।

जन्माष्टमी विशेष

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