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Thursday, April 15, 2021

करुणा स्वयँ माँ जानकी- मेरी आराध्यदेवी माता सीता को समर्पित

 





करुणा-निधान प्रभु राम हैं तो,
करुणा स्वयँ माँ जानकी।
हैं भक्त-वत्सल भगवान  तो,
वात्सल्य-रूपिणी भगवती।

क्षमा-मंदिर प्रभु राम हैं तो,
क्षमा स्वयँ माँ जानकी।
हैं दीन-बन्धु भगवान तो,
दया स्वयँ माँ भगवती।

मंगल-भवन प्रभु राम हैं तो,
सुमंगला माँ जानकी।
व्याधि हरें  भगवान तो,
सुख-स्वाथ्य दें माँ भगवती।

जिस भाव के भूखे प्रभु,
वह भावना माँ जानकी।
जिस प्रीति से प्रकटें प्रभु,
वह प्रीति है माँ भगवती।

विष्णु-स्वरूप प्रभु राम हैं तो,
लक्ष्मी-स्वरूपा जानकी।
पुरुषोत्तम हैं भगवान तो,
प्रकृति स्वयँ माँ भगवती।

करुणा-निधान प्रभु राम हैं तो,
करुणा स्वयँ माँ जानकी।
हैं भक्त - वत्सल भगवान तो,
वात्सल्य-रूपिणी भगवती।

अनंता सिन्हा


Tuesday, February 23, 2021

परिहास

 




किसी के मन पर आघात हुआ,
क्या वह सच्चा परिहास हुआ?
करे नष्ट किसी का स्वाभिमान,
क्या सच्ची होगी वह मुस्कान?

नित्य नया परिहास हो,
पर सदा निर्मल रहे।
ईर्ष्या, निन्दा या छल से भर कर,
नहीं किसी का उपहास बने।

वाणी में व्यंग्य न इतना घुले,
लज्जा से किसी का शीश झुके।
किसी का आत्मविश्वास टूटे,
या किसी का धैर्य छूटे।
कोई कुस्मृति याद आ जाए,
मन अवसाद से घिर जाए।
किसी के मन में ग्लानि भरे,
या किसी की एकाकी बढ़े।

परिहास सदा इतना सुख दे,
किसी रोगी को स्वस्थ करे।
किसी की चिंता हरण करे,
किसी का मन आश्वस्त करे।
किसी की भूल सुधारे,
ग्लानि न दे,
किसी अकेले की एकाकी हरे ।
किसी शत्रुता का नाश करे,
किसी मित्रता को आबाद करे।

सदा ऐसा विनोद हो,
किसी के नयन न नीर भरे।
इतना निश्छल हर हास्य हो,
कि सब के मन मुस्कान भरे।

 © अनंता सिन्हा


Wednesday, January 13, 2021

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ।

 








उत्सव की भोर सुनहरी आई ,

संग संक्रान्ति पर्व है लायी। 

ओढ़े धरा चुरनिया धानी,

खेतों में फसलें लहलहाईं। 


जिसने सही धुप और  छाया,

माटी से मोती उपजाया, 

उस किसान को शीश झुकाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


 खिचड़ी, घी  ,तिलकुट, पापड़,

खाएँ  भोजन सात्विक सुँदर। 

 तन-मन की तुष्टि पाएँ ,

अन्न ही ईश  यह भाव जगाएँ। 

भूखे पेट न कोई जाए 

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ । 


खेतों में चौपाल सजाएँ ,

आग तापें , गप्पें लड़ाएँ। 

झूम- झूम  कर   भंगड़ा  नाचें ,

प्रियजनों संग खुशियाँ मनाएँ। 

लोहड़ी का आनंद उठायें ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


अग्नि में करें तिल  अर्पण ,

एक-दूजे को तिल -गुड़  खिलायें। 

करें  सब का मुँह मीठा ,

हर रिश्ते में मिठास आए। 

आपसी बैर भूल सभी ,

प्रेम का पावन पर्व मनाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


ढपली बजा  कर  बीहू नाचें ,

साल का पहला पर्व मनाएँ। 

सूखे  घास का कुटीर बना ,

वंदन -वार से उसे सजाएँ। 

पकवानों का भोग लगा,

संग बैठ भोगाली पाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाये। 


खुशियाँ  बाटें , दुःख भूल सभी ,

अग्निदेव की स्तुतियाँ  गाएँ ,

उनके नाम की मेजी जला कर ,

उनसे ऊर्जा ऊष्मा पाएँ। 

भोग से भक्ति की यात्रा ,

नवजीवन का पर्व मनाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


क्षीर भरी पोंगल छलके ,

घर -घर  शुभ-लाभ  छलकाए। 

कर  सूर्यदेव को पोंगल अर्पण ,

सभी मिल कर  प्रसाद पाएँ  । 

भरे घर-भंडार सभी के ,

सुख- समृद्धि घर -घर छाये ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ । 


उमंग -भरे छत पर आयें ,

रंग-बिरंगी पतंग उड़ाएँ।

दें छोटों को प्यार ,

बड़ों से आशीष पाएँ। 

ग्लानि चिंता भय  त्यागें ,

मुक्ति का  पावन पर्व मनाएँ ,

आओ  मिल संक्रान्ति मनाये। 


अनेकता में एकता का संगम ,

मेरा भारत देश अनुपम। 

एक साथ त्यौहार मना कर ,

विविधता का आनंद उठायें। 

जुड़ कर भारत की मिट्टी  से ,

भारतीय होने का गौरव पायें 

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ।  

   © अनंता सिन्हा 

१३ /०१/२०२०१ 



Friday, January 1, 2021

कर सको तो करो।


हर नव- वर्ष की शुरुवात लोग नई प्रेरणा और नए संकल्प के साथ  करते हैं , इस तरह "न्यू यर रेज़ोल्यूशन" लेने की प्रथा चली आ रही है और चलती रहेगी। 

नव - वर्ष २०२१ की शुभ-कामनाओं के साथ  मेरी यह प्रेरक कविता "कर सको तो करो " 










 कर सको तो करो मित्रता,

शत्रुता से दूर रहो। 

बना सको तो दोस्त बनाओ,

लोगों में तुम प्यार बढ़ाओ। 


बोल सको तो मधुर बोलो,

करवाहट मत घोलो। 

शीतल जल सी मीठी वाणी,

मन को शीतल करती है,

कभी - कभी बाणों से ज़्यादा ,

वाणी ही आहत करती है। 


मिटा सको तो दुश्मनी मिटा दो,

नहीं तो दुश्मनी मिटा देगी। 

आने वाली पीढ़ी को,

तुम्हारे संग पिटवा देगी। 


घटा सको तो तिमिर घटाओ ,

अपने मन में उल्लास जगाओ। 


पारस पत्थर लोहा छू कर ,

सोना उसे बना देता है। 

पर अपनी शक्ति वह ,

सोने को न दे पाता  है। 


पारस पत्थर से अच्छा,

तुम खुद को दीप बना लेना। 

दीप जलाने की शक्ति,

हर दीपक में पहुंचा देना। 


सीख सको तो हँसना  सीखो,

कीमती होते हँसी  के क्षण ,

जो जितना हँसता है,

उतना खुश रहता उसका मन। 


 पी सको तो गुस्सा पीलो,

क्रोध अक्ल को खाता है। 

प्यार और शान्ति से बोल कर देखो ,

काम सुलभ हो जाता है। 

 

कितने भी गहरे रहें गर्त,

स्नेह हर जगह जा सकता है। 

कितना ही भ्रष्ट ज़माना हो ,

स्नेह सब को भा सकता है। 


नए संकल्पों की बेला ,

ले कर आया नव - वर्ष। 

है यह मंगल -कामना,

हो सब का उत्कर्ष। 

© अनंता सिन्हा

01.01.2021


Saturday, November 21, 2020

यदि तुम मुझ से मित्रता करना...................





 यदि तुम मुझ से मित्रता करना,

तो केवल  मित्रता के लिए करना। 

मुझे मेरी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ अपनाना,

हाँ, बाद में तुम मेरी बुराइयाँ  सुधार देना। 


 तुम मुझसे मित्रता इसलिए मत करना,

 क्यूँकि  मैं हिंदी में अच्छी हूँ। 

क्यूंकि यह जान कर  तुम मुझ से मित्रता तोड़ दोगे,

मैं गणित में बहुत ही बुरी हूँ।  


तुम मुझ से मित्रता मेरी सहायता मांगने के लिए मत करना,

ना ही  मेरी सहायता करने के लिए करना। 

यदि  मुझ से मित्रता  करना,

तो उसे कभी मत तोड़ना। 


यदि तुम मुझ से मित्रता करना,

तो मुझे मेरी भूल ज़रूर बताना,

मेरा गलत काम में साथ मत देना।


मुझे टूटने मत देना ,

मुझे भटकने मत देना, 

मुझ पर संदेह मत करना ,

मुझे हमेशा क्षमा करना ,

और मुझ पर अपनी मित्रता का अधिकार हमेशा जताना। 


हम जब भी मित्रता करेंगे,

उस स्नेह के लिए करेंगे  जो हम एक -दुसरे को देंगे,

उस आनंद के लिए जो हम एक साथ समय बिता कर  पायेंगे,

उन खेलों के लिए  जो हम एक साथ खेलेंगे ,

उस विनोद के लिए जो हम एक साथ  करके हँसे- हंसाएँगे,

उस मानसिक बल के लिए जो हम एक -दुसरे से पाएँगे,

उस साथ के लिए जो हम सदा निभायेंगे। 


© अनंता सिन्हा । 


 

Friday, October 23, 2020

स्नेहामृत











परस्पर स्नेह की अमृत- धारा,

 इस  जग में जहाँ बह जायेगी। 

क्षमा, दया और करुणा ,

वहाँ स्वतः चली आएगी। 


अपरिचित को अपरिचित से ,

सहायता सुलभ मिल जायेगी। 

असहाय और दीन भावना,

स्वतः नष्ट हो जायेगी। 


स्नेह की अमृत धार पा कर ,

रोगी  भी स्वस्थ हो जाएँगे। 

बंदीगृह मनोचिकित्सालय ,

 युद्ध-क्षेत्र  खाली हो जाएँगे। 


स्नेह भाव से ओत - प्रोत,

मनुष्य हिंसा नहीं कर पायेगा। 

करुणा और क्षमा-शीलता से परिपूर्ण,

ह्रदय क्रोध पर  विजय  पा जाएगा। 


स्नेह के कारण कण कण में, 

भगवंत  समा  जाएँगे

मंदिर - मस्जिद  जाए बिना ही,

 ईश्वर मिल जाएँगे। 


स्नेह के वश  माँ  भगवती  भी,

पुकार सुन दौड़ी  आएँगी। 

हो स्नेह-पूर्ण  हृदय  हमारा,

 पत्थर की मूरत भी मुस्कायेगी। 


स्नेह-रूपी जल से,

क्रोधाग्नि  बुझ  जायेगी। 

मधुरता का वास होगा ,

कटुता न स्थान ले पाएगी। 


अतिशय स्नेह के कारण 

पाषाण  पिघल जाएँगे। 

मरणासन्न  उठ  खड़े  होंगे ,

निर्जीव  जीवित  हो  जाएँगे। 


 स्नेह की अमृत -धार जहाँ ,

वहाँ  त्याग आ जायेगा। 

मुझ को तुम से अधिक मिले,

यह लोभ मिट  जाएगा। 


भूमि , धन और सत्ता के लिए ,

रक्तपात बंद हो जाएगा। 

मानवता का मानवता से,

अटूट संबन्ध  जुड़ जाएगा। 


बड़ी से बड़ी कमी भी,

 स्नेहामृत से पूरी हो जायेगी। 

स्नेहामृत की जीवन दायनी धारा ,

पूर्णता को परिपूर्णता  दे जायेगी। 


                                                


©अनंता सिन्हा 

12.10.2014




 





Sunday, August 23, 2020

पुस्तकें







A Third of Teenagers Don't Read Books for Pleasure Anymore | Time



                                                                    Literature books read heart hobby book bookshelf | Free Photo



Mom and child reading a book Stock Photo by choreograph | PhotoDune


बिना किसी सूत्रधार के मुझे अनगिनत कथाएं सनातीं हैं,

चमत्कारी रूप से अलग संसार में ले जातीं हैं। 


प्राचीनता से आधुनिकता की  यात्रा मुझे कराती हैं ,

विविध देश विदेश के पर्यटनों  पर ले जातीं हैं। 


महा-पुरुषों के जीवन की गाथाएं वह गाती  हैं,

हमारी संस्कृति से हमारी पहचान कराती हैं । 


कभी मनोरंजन , कभी मनोमंथन का साधन बनतीं हैं ,

देतीं सुविचार हमें , जीवनमूल्य सिखातीं हैं। 


ज्ञान का भंडार दे, समस्या का  समाधान सुझातीं  हैं ,

मेरी एकाकी में मेरी पुस्तकें सहस्त्र  सखियों का धर्म निभातीं हैं।  

©अनंता सिन्हा 

12.10.2015

शुभ रामनवमी

करुणा स्वयँ माँ जानकी- मेरी आराध्यदेवी माता सीता को समर्पित

  करुणा-निधान प्रभु राम हैं तो, करुणा स्वयँ माँ जानकी। हैं भक्त-वत्सल भगवान  तो, वात्सल्य-रूपिणी भगवती। क्षमा-मंदिर प्रभु राम हैं तो, क...