Wednesday, January 13, 2021

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ।

 








उत्सव की भोर सुनहरी आई ,

संग संक्रान्ति पर्व है लायी। 

ओढ़े धरा चुरनिया धानी,

खेतों में फसलें लहलहाईं। 


जिसने सही धुप और  छाया,

माटी से मोती उपजाया, 

उस किसान को शीश झुकाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


 खिचड़ी, घी  ,तिलकुट, पापड़,

खाएँ  भोजन सात्विक सुँदर। 

 तन-मन की तुष्टि पाएँ ,

अन्न ही ईश  यह भाव जगाएँ। 

भूखे पेट न कोई जाए 

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ । 


खेतों में चौपाल सजाएँ ,

आग तापें , गप्पें लड़ाएँ। 

झूम- झूम  कर   भंगड़ा  नाचें ,

प्रियजनों संग खुशियाँ मनाएँ। 

लोहड़ी का आनंद उठायें ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


अग्नि में करें तिल  अर्पण ,

एक-दूजे को तिल -गुड़  खिलायें। 

करें  सब का मुँह मीठा ,

हर रिश्ते में मिठास आए। 

आपसी बैर भूल सभी ,

प्रेम का पावन पर्व मनाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


ढपली बजा  कर  बीहू नाचें ,

साल का पहला पर्व मनाएँ। 

सूखे  घास का कुटीर बना ,

वंदन -वार से उसे सजाएँ। 

पकवानों का भोग लगा,

संग बैठ भोगाली पाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाये। 


खुशियाँ  बाटें , दुःख भूल सभी ,

अग्निदेव की स्तुतियाँ  गाएँ ,

उनके नाम की मेजी जला कर ,

उनसे ऊर्जा ऊष्मा पाएँ। 

भोग से भक्ति की यात्रा ,

नवजीवन का पर्व मनाएँ ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ। 


क्षीर भरी पोंगल छलके ,

घर -घर  शुभ-लाभ  छलकाए। 

कर  सूर्यदेव को पोंगल अर्पण ,

सभी मिल कर  प्रसाद पाएँ  । 

भरे घर-भंडार सभी के ,

सुख- समृद्धि घर -घर छाये ,

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ । 


उमंग -भरे छत पर आयें ,

रंग-बिरंगी पतंग उड़ाएँ।

दें छोटों को प्यार ,

बड़ों से आशीष पाएँ। 

ग्लानि चिंता भय  त्यागें ,

मुक्ति का  पावन पर्व मनाएँ ,

आओ  मिल संक्रान्ति मनाये। 


अनेकता में एकता का संगम ,

मेरा भारत देश अनुपम। 

एक साथ त्यौहार मना कर ,

विविधता का आनंद उठायें। 

जुड़ कर भारत की मिट्टी  से ,

भारतीय होने का गौरव पायें 

आओ मिल संक्रान्ति मनाएँ।  

   © अनंता सिन्हा 

१३ /०१/२०२०१ 



Friday, January 1, 2021

कर सको तो करो।


हर नव- वर्ष की शुरुवात लोग नई प्रेरणा और नए संकल्प के साथ  करते हैं , इस तरह "न्यू यर रेज़ोल्यूशन" लेने की प्रथा चली आ रही है और चलती रहेगी। 

नव - वर्ष २०२१ की शुभ-कामनाओं के साथ  मेरी यह प्रेरक कविता "कर सको तो करो " 










 कर सको तो करो मित्रता,

शत्रुता से दूर रहो। 

बना सको तो दोस्त बनाओ,

लोगों में तुम प्यार बढ़ाओ। 


बोल सको तो मधुर बोलो,

करवाहट मत घोलो। 

शीतल जल सी मीठी वाणी,

मन को शीतल करती है,

कभी - कभी बाणों से ज़्यादा ,

वाणी ही आहत करती है। 


मिटा सको तो दुश्मनी मिटा दो,

नहीं तो दुश्मनी मिटा देगी। 

आने वाली पीढ़ी को,

तुम्हारे संग पिटवा देगी। 


घटा सको तो तिमिर घटाओ ,

अपने मन में उल्लास जगाओ। 


पारस पत्थर लोहा छू कर ,

सोना उसे बना देता है। 

पर अपनी शक्ति वह ,

सोने को न दे पाता  है। 


पारस पत्थर से अच्छा,

तुम खुद को दीप बना लेना। 

दीप जलाने की शक्ति,

हर दीपक में पहुंचा देना। 


सीख सको तो हँसना  सीखो,

कीमती होते हँसी  के क्षण ,

जो जितना हँसता है,

उतना खुश रहता उसका मन। 


 पी सको तो गुस्सा पीलो,

क्रोध अक्ल को खाता है। 

प्यार और शान्ति से बोल कर देखो ,

काम सुलभ हो जाता है। 

 

कितने भी गहरे रहें गर्त,

स्नेह हर जगह जा सकता है। 

कितना ही भ्रष्ट ज़माना हो ,

स्नेह सब को भा सकता है। 


नए संकल्पों की बेला ,

ले कर आया नव - वर्ष। 

है यह मंगल -कामना,

हो सब का उत्कर्ष। 

© अनंता सिन्हा

01.01.2021


जन्माष्टमी विशेष

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  तेरह साल की रेणुका अपनी दादी  के साथ भागवत कथा सुनने द्वारिकाधीश आयी थी। ऐसे तो उसके माता-पिता साथ आते पर उन्हें दफ्तर का कुछ ज़रूरी काम आ ...