Sunday, August 23, 2020

पुस्तकें







A Third of Teenagers Don't Read Books for Pleasure Anymore | Time



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Mom and child reading a book Stock Photo by choreograph | PhotoDune


बिना किसी सूत्रधार के मुझे अनगिनत कथाएं सनातीं हैं,

चमत्कारी रूप से अलग संसार में ले जातीं हैं। 


प्राचीनता से आधुनिकता की  यात्रा मुझे कराती हैं ,

विविध देश विदेश के पर्यटनों  पर ले जातीं हैं। 


महा-पुरुषों के जीवन की गाथाएं वह गाती  हैं,

हमारी संस्कृति से हमारी पहचान कराती हैं । 


कभी मनोरंजन , कभी मनोमंथन का साधन बनतीं हैं ,

देतीं सुविचार हमें , जीवनमूल्य सिखातीं हैं। 


ज्ञान का भंडार दे, समस्या का  समाधान सुझातीं  हैं ,

मेरी एकाकी में मेरी पुस्तकें सहस्त्र  सखियों का धर्म निभातीं हैं।  

©अनंता सिन्हा 

12.10.2015

Thursday, August 13, 2020

स्वातंत्र गाथा

 








हे प्राणप्रिय जीवन संगिनी, 
गृह लक्ष्मी मेरे आंगन की,
मेरी हृदय उल्लासिनी,
स्वामिनी मेरे मन की।

जब तुम मुझ से ब्याह कर घर आयी थी,
यह बात न मन में लायी थी,
तेरे पायल की झनक से, 
तेरे कंगन की खनक से,
यूँ दूर मैं चला जाऊंगा,
तेरे समर्पण को यूं  ठुकराउँगा।

पर मैं नहीं पति बस तेरा हूँ,
मैं भारत माँ का भी बेटा हूँ 

इस भूमि पर घुसपैठ किया,
आए बन कर व्यापारी, 
अब शासक बन बैठे हैं,
यह अंग्रेज़ी अतिक्रमणकारी।

दीन-हीन जनता भारत की,
कष्ट सह रही भारी,
गौ और विधवा को सता रहे हैं,
यह विदेशी अत्याचारी।

तुम्हें छोड़ मुझे अब जाना होगा, 
अपना धर्म निभाना होगा,
कर विजय तिलक मेरे माथे पर,
तुम मुझ को विदा करो अब हंस कर।


तुम पत्नी हो एक वीर पुरुष की,
नहीं कोई सामान्य नारी हो,
भले जन्मी तुम साधारण घर में,
 पर मन से तुम क्षत्राणी हो।


पुण्य-भूमि भारत माता की,
कल रणभूमि बनेगी,
शीष कटेंगे आतताइयों के,
धरती लहू पीयेगी।

स्वाधीनता संग्राम की अग्नि से,
ग़ुलामी  के बंधन टूटेंगे। 
प्राणों की आहुति देकर,
पराधीनता  के शाप से छूटेंगे। 

जब भी मनुष्य इस पृथ्वी पर जन्म लेकर के आता है,
स्वाभिमान पूर्ण स्वतंत्र जीवन का उपहार ईश्वर से पाता है।

फिर हम क्यूँ छिन जाने दें,
अपने जन्मसिद्ध अधिकारों को,
क्यूँ मौन हो सहते रहें निशिदिन,
इनके अत्याचारों को।

स्वाभिमान के कुचले जाने से,
शस्त्र उठाना अच्छा है,
रोज़ रोज़ तिल-तिल मरने से,
एक बार मर जाना अच्छा है।

अतः प्रिये मुझे अब जाने दो,
अपना करतब कुछ दिखलाने दो।
मैं लौट अवश्य ही आऊंगा,
यह मेरा वचन है तुमसे,
आऊँ भारत माँ को मुक्त करा कर,
या अर्थी पर चढ़ के।

घर से चला वह वीर,
अपनी पत्नी से इतना कह कर,
मर-मिटा अपनी जन्म-भूमि पर,
लौटा कफन में बंध कर।

थी धन्य उस वीर की पत्नी,
न निकली मुख से करुण पुकार,
उसका स्वागत करने आई,
कर सोलह श्रृंगार।
 
उसको करबद्ध नमन किया,
लिया अपने आलिंगन में,
नयनों में अश्रु रोक कर,
कहा रुंधे गले से।

हो धन्य तुम भारत के गौरव,
है धन्य तुम्हारा स्वाभिमान,
तुम नहीं केवल हो मेरे प्राण,
देश - भक्ति के तुम भूषण महान।

इसी प्रकार कई वीरों ने,
अपने घर से विदा ली,
स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े,
और जान की बाज़ी लगा दी।

इसी प्रकार कई पत्नियों ने,
अपना सिंदूर मिटाया,
इसी प्रकार कई माताओं ने,
 अपनी कोख लुटाया|

इसी प्रकार कई बहनों ने,
 अपने भाई की बलि चढ़ा दी,
इसी प्रकार कई पुत्रियों ने,
अपने पिता को सदा के लिए विदा दी।

इन्हीं वीरों के बलिदानों से,
हम ने स्वतंत्रता पायी,
आज़ादी की चादर ओढ़े,
पंद्रह अगस्त की तिथि आयी।

पर कहीं नहीं इन वीरों का,
 इतिहास में नाम लिखा है,
इनके असीम बलिदानों को,
बस काल चक्र ने देखा है।

ऐसे ही एक गुमनाम वीर की,
में यह कथा सुनाती हूँ,
इन्हें और इनके परिवारों को,
में नित नित शीष झुकाती हूँ।

©अनंता सिन्हा
 15/8/2017

ऑडियो :- अनंता  सिन्हा (सर्वाधिकार सुरक्षित )

Monday, August 10, 2020

विशेष सूचना

 मुझे यह बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि मेरी लिखी कविताओं को मेरी बहुत ही प्यारी और मुझे सदैव ही प्रोत्साहित  करने वाली भारती आंटी  मेरी कविताओं को स्वर दे कर मेरी कविताओं और मेरे ब्लॉग की सुंदरता को और भी  बढ़ा रहीं हैं। वे अनन्य साहित्य प्रेमी हैं और हिंदी भाषा के प्रति उनका लगाव हम सब के लिए एक प्रेरणा है। 

उनका यह स्नेह मेरे लिये बहुत ही अमूल्य है और  उनका मेरी कविताओं को स्वर देना मेरे लिये उनका आशीष है।

आज उनकी आवाज़ में सुनिये  "एक शिक्षिका की दृष्टि से"


Sunday, August 2, 2020

विनती


करती  हूँ मैं वंदना नत सिर बारंबार,
मुझे  दें परमात्मन नित मंगल शुभ कार्य। 

दोनों  कर ये जोड़ कर  करती हूँ अनुरोध ,
प्रेम की सरिता बहे , मिटे  क्रोध- प्रतिशोध। 

संशय वृत्ति मिटाइये , दीजिये विनय का दान ,
सब के मन विश्वास बढ़े, विसर्जित हो अभिमान। 

क्षमा सभी को कर  सकें हम मन से घृणा को त्याग,
भीतर कभी न भस्म करे हमें द्वेष की आग। 

संबंधों  को जोड़ कर , कीजिये यह उपकार,
अपनों का संग  दीजिये, एकाकी उतारें  पार। 

कुसंग से सदा बचाइए, दें सच्चे मित्रों  का संग ,
दीपावली में दीप जलें , बरसे होली में रंग। 

महावीर  रघुवीर - दूत,  मंगल मूर्ती रूप ,
प्राप्त करूं मैं आपको अपने भ्राता स्वरुप। 

पूज रही हूँ आपको अपना अग्रज मान,
रक्षा मेरी कीजिये  मेरे प्रिय हनुमान। 

©अनंता सिन्हा

जन्माष्टमी विशेष

जब कान्हा आए .................. (कहानी )

  तेरह साल की रेणुका अपनी दादी  के साथ भागवत कथा सुनने द्वारिकाधीश आयी थी। ऐसे तो उसके माता-पिता साथ आते पर उन्हें दफ्तर का कुछ ज़रूरी काम आ ...