कान्हा मैं Gen zee हुँ,
मैं मंदिरों से ज़्यादा कैफ़े जाती हुँ।
कान्हा मैं तुमसे मंदिर में नहीं,
कैफ़े में मिलना चाहती हुँ।
तुम मंदिर में मिलोगे, मैं तुम्हारी स्तुति करुँगी।
तुम मौन खड़े रहोगे, मैं अपनी अपूर्णताएं गिनूंगी।
न सौंपूँगी अपना हृदय तुम्हें, न मेरी एकाकी मिटेगी,
बताओ, ऐसी पूजा मुझे क्या ही फलेगी ?!
मैं तुम्हें पूजना नहीं,
तुम्हारे साथ समय बिताना चाहती हुँ।
कान्हा मैं तुमसे मंदिर में नहीं,
कैफ़े में मिलना चाहती हुँ।
अनंता सिन्हा
०८ /१० /२०२६


बहुत ही सुन्दर रचना। लोग सोचते हैं gen Z भगवान् में विश्वास नहीं रखते हैं और आस्था से उनका कोई वास्ता नहीं है मगर तुम्हारी कविता ने इस धारणा को बड़ी बखूबी से खंडन किया है। इस छोटी सी कविता के भाव ने हृदय को छू लिया है।
ReplyDeleteधन्यवाद माँ। लव यू। वास्तव में Gen Z को कान्हा की आवश्यकता ईश्वर के रूप में कम और सखा के रूप में अधिक है। मंदिर में कान्हा कभी कभी हमसे दूर दिखाई देते हैं और हमें उनका अपनत्व चाहिए
ReplyDeleteप्रिय अनंता,तुम्हारी रचना पढ़ी। अपनी पीढ़ी के भावबोध और अभिव्यक्ति की सहजता से तुमने एक सुंदर प्रश्न उठाया है। कान्हा को मंदिर की औपचारिकताओं से बाहर, अपने जीवन के सहज और आत्मीय परिवेश में पाने की तुम्हारी आकांक्षा तुम्हारी पीढ़ी की सोच को अभिव्यक्त करती है।
ReplyDeleteईश्वर के साथ स्तुति और आराधना से आगे बढ़कर संवाद, मैत्री और आत्मीयता का संबंध चाहना तुम्हारी रचना का विशिष्ट पक्ष है। कैफ़े यहाँ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि सहज संवाद और निकटता का प्रतीक बनकर उभरता है।
हर पीढ़ी अपने समय के प्रश्नों को अपनी भाषा में व्यक्त करती है।
तुम्हारी यह रचना भी उसी अभिव्यक्ति का एक प्रयास है। लिखती रहो, पढ़ती रहो और अपने भावों को निरंतर परिष्कृत करती रहो। तुम्हारी लेखनी में संभावनाएँ हैं।
तुम्हें हार्दिक स्नेहाशीष!अपनी अभिव्यक्ति का पथ सदा खुला रखना ❤️
अनूठी भावना तुम्हारी अनंता....
ReplyDeleteमंदिर में मौन अभ्यर्थना भक्ति में पूर्णतया समर्पित अंतर्मन के रहस्यों को
टटोलकर एकतरफा संवाद का होता किंतु कैफे जाने वाली पीढ़ी
सिर्फ अपने अंतर में उठे प्रश्नों का उत्तर भी चाहती है वो कान्हा से अपनी जिज्ञासा
अपनी उत्सुकता मित्रवत पूछना चाहती है।
छोटी,प्यारी सी रचना में बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
लिखती रहो, स्वयं को परिष्कृत करती रहो बहुत जरूरी है।
सक्रिय रहो।
सस्नेह।
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A very nice and simple expression of poetry and your language command is as usual beautiful. Actually kanha tumhe mandir me bhi milenge aur Cafe me bhi! Vaiseandir bhi unka Cafe hi hai..Cafe me light music play karte hain aur mandir me bhajan, Cafe me snacks aur coffee milte hain toh mandir me prasaad aur teerth! Bas hum Mandir mein sahi bhaav le jaan bhool chuke hain! Bhaav samsaarik toh mandir bhi cafe ban jaaye aur bhaavm paramaarthik toh cafe bhi mandir!
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 11 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
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